✍️ शासकीय जमीन पर कब्जे के आरोप के बावजूद मकान पर नहीं चला बुलडोजर, शहर में भेदभाव और साठगांठ की चर्चा तेज
कोरबा। नगर निगम कोरबा की हालिया अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। शनिवार को मुड़ापार स्थित अंबेडकर भवन के बाजू निगम की टीम अतिक्रमण हटाने पहुंची, लेकिन कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर अपनाए गए दोहरे रवैये ने लोगों में नाराजगी पैदा कर दी है। आरोप है कि शासकीय जमीन पर कब्जा कर मकान निर्माण कराने वाले निगम कर्मचारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के बजाय टीम केवल बाउंड्री और घेरा तोड़कर लौट गई।
निगम कर्मचारी पर शासकीय भूमि कब्जाने का आरोप
स्थानीय नागरिकों के अनुसार, नगर निगम के कर्मचारी **मनोज बक्सेल** पर मुड़ापार अंबेडकर भवन के समीप शासकीय जमीन पर अतिक्रमण कर मकान निर्माण कराने का आरोप है। क्षेत्र में अन्य लोगों द्वारा किए गए कथित कब्जों की शिकायतें भी प्रशासन तक पहुंची थीं, जिसके बाद निगम की अतिक्रमण विरोधी टीम मौके पर कार्रवाई के लिए पहुंची।
कार्रवाई के दौरान भेदभाव के आरोप
प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि निगम अमले ने कुछ स्थानों पर बाउंड्री और घेरे को तोड़ने की कार्रवाई की, लेकिन जब टीम निगम कर्मचारी से जुड़े निर्माण तक पहुंची तो कार्रवाई की गति थम गई। आरोप है कि मकान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया और जेसीबी बिना निर्माण को छुए ही वापस लौट गई।
इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय लोगों ने निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया कि आम नागरिकों और निगम कर्मचारियों के मामलों में अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं।
शहर में चर्चा का विषय बना मामला
कार्रवाई के बाद पूरे शहर में इस बात को लेकर चर्चा है कि यदि अतिक्रमण शासकीय भूमि पर हुआ है, तो फिर संबंधित निर्माण पर समान कार्रवाई क्यों नहीं की गई। नागरिकों का कहना है कि कानून का पालन सभी पर एक समान होना चाहिए और किसी भी व्यक्ति को उसके पद या विभागीय संबंधों के आधार पर राहत नहीं मिलनी चाहिए।
नागरिकों की मांग: निष्पक्ष जांच और समान कार्रवाई
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे की पुष्टि होती है तो संबंधित निर्माण के खिलाफ भी वही कार्रवाई की जाए जो अन्य अतिक्रमणकारियों पर की जाती है। साथ ही, यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने की भी मांग उठ रही है।
निगम की चुप्पी से बढ़े सवाल
मामले को लेकर निगम अधिकारियों की ओर से फिलहाल कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि कार्रवाई को लेकर उठ रहे भेदभाव और साठगांठ के आरोपों पर स्थिति साफ हो सके।
जनता के प्रमुख सवाल
* यदि अतिक्रमण अवैध है तो सभी मामलों में समान कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
* शासकीय जमीन पर कब्जे के आरोपों की जांच कब होगी?
* संबंधित कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी या नहीं?
* जेसीबी ने कथित निर्माण को बिना छुए क्यों छोड़ दिया?
* क्या निगम आगे कोई अतिरिक्त कार्रवाई करेगा?
कानून क्या कहता है?
**छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956** के तहत शासकीय अथवा निगम की भूमि पर अतिक्रमण दंडनीय माना गया है। नियमों के अनुसार, निगम को बिना भेदभाव के अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है। वहीं, यदि किसी शासकीय कर्मचारी पर अवैध कब्जे के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो उसके खिलाफ विभागीय जांच सहित अन्य प्रशासनिक कार्रवाई भी की जा सकती है।
निगम का पक्ष जानना जरूरी
मामले में लगाए जा रहे आरोपों की निष्पक्षता और सत्यता के लिए नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। प्रशासनिक प्रतिक्रिया आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कार्रवाई अधूरी क्यों रही और आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।

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