✍️ कोरबा। शहर और आसपास के इलाकों में कथित झोला छाप डॉक्टरों की ‘क्लिनिक क्रांति’ बढ़ती नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि गली-मोहल्लों में इलाज की सुविधा देखकर कभी-कभी लगता है—कोरबा में अस्पताल कम और डॉक्टर बनाने की फैक्ट्री ज्यादा खुल गई है!
कहीं छोटी सी दुकान के आगे बोर्ड लगा है, कहीं घर के कमरे में मरीजों की लाइन है। बस फर्क इतना है कि बड़े अस्पताल में डॉक्टर की डिग्री और पंजीयन पूछा जाता है, यहां कभी-कभी मरीज ही सोचता रह जाता है— *“डॉक्टर साहब आखिर डॉक्टर बने कब?”*
मजेदार बात यह है कि कुछ कथित चिकित्सकों के पास हर बीमारी का इलाज मानो ‘ऑल-इन-वन पैकेज’ में उपलब्ध है। बुखार हो, पेट दर्द हो या शरीर में दर्द—इलाज की उम्मीद एक ही जगह! मरीज भी सोचता है, “जब पड़ोस में इलाज मिल रहा है तो अस्पताल जाकर जेब क्यों हल्की करें?”
लेकिन इस मजाक के पीछे मामला गंभीर है। बिना उचित योग्यता या वैध पंजीयन के इलाज किए जाने की स्थिति में मरीजों की जान और स्वास्थ्य पर खतरा हो सकता है।
अब सवाल स्वास्थ्य विभाग से है— *क्या कोरबा में ऐसे कथित डॉक्टरों की तलाश के लिए कोई ‘गुप्त मिशन’ चल रहा है, या विभाग को भी उनके क्लीनिक का पता मरीजों से ही पूछना पड़ेगा?*
लोगों की मांग है कि जिले में संचालित निजी क्लीनिकों और उपचार केंद्रों की जांच हो तथा जहां नियमों का उल्लंघन मिले, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
फिलहाल असली सवाल यही है— *कोरबा में डॉक्टर बढ़ रहे हैं या सिर्फ डॉक्टरों के बोर्ड?*
आगे की खबरों के लिए बने रहिए…*शांता न्यूज़ डिजिटल* के साथ क्योंकि कोरबा में खबरें खत्म नहीं होतीं, बस अगला ‘इलाज’ ढूंढना पड़ता है! 😄।

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