छत्तीसगढ़ के चांपा और रायगढ़ जिलों की सीमा पर एक बड़े कबाड़ माफिया नेटवर्क के सक्रिय होने की सनसनीखेज जानकारी सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, कोरबा में राजेश नाम के व्यक्ति के संरक्षण में वसीम, और सुभाष जैसे गुर्गे इस अवैध कारोबार को एक सोची-समझी रणनीति के तहत अंजाम दे रहे हैं।
संचालन का तरीका: छोटे से बड़ा खेल
जानकारी के अनुसार, यह गिरोह अलग-अलग इलाकों में फैलकर छोटे पैमाने पर अवैध लोहा, तांबा, एल्युमिनियम और अन्य कीमती स्क्रैप इकट्ठा करता है। पकड़े जाने के डर से इसे सीधे नहीं बेचा जाता, बल्कि पहले छोटे-छोटे ‘सेफ हाउस’ या ठिकानों पर डंप किया जाता है।
थानों की सीमा और चांपा का ‘सेफ पैसेज’
जब माल पर्याप्त मात्रा में जमा हो जाता है, तो उसे छोटे मालवाहकों में भरकर चांपा जिले की ओर रवाना किया जाता है। हैरानी की बात यह है कि यह परिवहन दो प्रमुख थाना क्षेत्रों के बीच से गुजरता है, लेकिन गिरोह की पैठ इतनी गहरी है कि अब तक पुलिस को इसकी भनक नहीं लग सकी है। चांपा सीमा में प्रवेश करने के बाद, इस छोटे स्टॉक को एक बड़ी औद्योगिक इकाई से निकलने वाले ‘चोरी के स्क्रैप’ में मिला दिया जाता है, जिससे इसकी पहचान करना नामुमकिन हो जाता है। अंत में, यह माल रायगढ़ के बड़े कबाड़ियों के पास खपा दिया जाता है।
अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा ‘सिंडिकेट’
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू पुलिस और साइबर सेल की भूमिका को लेकर उठ रहे सवाल हैं। हालांकि साइबर सेल में हाल ही में फेरबदल हुआ है, लेकिन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि इस इकाई के ‘तेजतर्रार खिलाड़ियों’ को इस अवैध गतिविधि की खबर न हो, यह संभव नहीं लगता।
सूत्रों के अनुसार, इनकी छोटी गाड़ियों को निकलवाने का काम थानों की सरहदों से यहीं के आरक्षक स्तर के स्टाफ के जरिए हो रहा है। सूत्र बताते हैं कि शहर क्षेत्र के एक महत्वपूर्ण थाना का आरक्षक उनके लिए मजबूत मुखबिर की भूमिका निभा रहा है और वह काफी लंबे समय से सक्रिय है।
कप्तान की सख्ती का डर
सूत्रों का कहना है कि यह पूरा सिंडिकेट इस तरह से काम कर रहा है कि इसकी सूचना जिले के पुलिस कप्तान (SP) तक न पहुंच सके। स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि यदि सीधे कप्तान तक यह मामला पुख्ता सबूतों के साथ पहुंचता है, तो इस सिंडिकेट और इसमें शामिल सफेदपोश चेहरों पर गाज गिरना तय है।

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